सोनळ राजस्‍थान रो एक सोनळ गांव। 'भाड़ंग' नांव सूं ओळखांण।
हाल तारानगर (रिणी), चूरू रै इलाकै मांय।
700 ईस्‍वी रै लगैटगै रो पुराणो इतियास।
नुंवै रूप सूं फेरूं बस्‍यूं।
हाल कैयो जा सकै कै भाड़ंग गांव, गांवां जिस्‍यो गांव।
आओ निरखां, परखां।
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राजस्‍थान के चूरू जिले की तारानगर तहसील।
तारानगर तहसील का एक छोटा-सा गांव :- भाड़ंग।
मेरी तरह के हजारों लोगों की जन्‍म-स्‍थली। जहां का कोई भी नागरिक आज तक देश-राज्‍य के नक्‍शें में खास नहीं बना, मगर फिर भी न जानें क्‍यों खास है - भाड़ंग। खास लेखा-जोखा भी नहीं। बस है तो सुनहरा इतिहास। फिर भी हिम्‍मत के साथ आए हैं हम बताने अपने गांव की खूबियां, जानेंगे आप ?

स्‍वागत है आपका।




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चूरू जिलै की तारानगर तहसील को नयो-पुराणो गांव : भाड़ंग

- सुबोध कुमार अग्रवाल
संस्‍थापक सदस्‍य, लोक संस्‍कृति शोध संस्‍थान, नगरश्री,
चूरू (राजस्‍थान)

चूरू जिलै में भी के बेरो किता नैं किता जूना गांव चूरू बसै पहली का ईं टीबा की गोद में आप का बच्चा-खुच्चा एनाण-सैनाण लियां सूत्यां हैं। पण देस को पुरा सोधक महकमों जिलै में कठै ही कांकरी कै हाल तो कोई कुदाळ की नोंक छुआई को है नीं।
चूरू जिलै की तारानगर तसील में चूरू सूं चाळीसेक मील उतरादो भाड़ंग गांव साहवै सैं कोई तीनेक कोस दिखणाद में जिको है; बो तो कोई डेढ़ सोक बरस होया ओजूं बस्योड़ो है। पण पुराणो भाड़ंग ठाकर स्व. माधोसिंह कांदलोत कै खेत मांय है। बिरखा रुत में थेड़ सैं कदे कदास पुराणा माटी का टूट्योड़ा ठीकरा'र पुराणा सिक्का मिल्या करै है।
लोक संस्कृति शोध संस्थान नगर-श्री, चूरू में जद गोविन्द अग्रवाल चूरू मंडल को इतिहास लिखणो तेवड़ राख्यो हो तो मैं पुराणै शहर तारानगर को जूनो जैन मंदिर सन 1966-67 में देखण गयो। मंदिर में बारलै दिरबारै कै आळै में दो अण दरकारी 11-12वीं सदी की जैन मूर्त्यां पड़ी ही, जिकी पूछणै पर भाड़ंग कै थेड़ सैं मिल्योड़ी बताई। जणा भाड़ंग जा'र थेड़ देखण की मन में लो लागगी। सन 1967-68 में मैं अर भाई गोविन्द, श्रीनिवास दिनोदियो, केसरीचंद पारख की जीप में भाड़ंग गया। भाड़ंग कै थेड़ पर जाणै ताणी बठै का राजवी गुलाबसिंघ जी म्हारै सागै दो आदमी भेज्या। बठै म्हानैं एक-दो मुगलां सैं पहलां का सिक्का, क्यू ठीकर्यां'र एक माटी को बण्योड़ो बैल को आधोक भाग मिल्यो थो; जिको नगर-श्री, चूरू कै संगरै में है।
दि. 29.06.1967 नैं भाड़ंग कै थेड़ पर म्हारै सागै जाण हाळा राजवी जी कै मिनखां सोहुवां सैं भाड़ंग सारणां कै हाथ आणै की एक दंत कथा सुणाई- भाड़ंग पर पहली सोहुवै जाटां को कब्जो हो। सोहुवां की एक डीकरी सारण जाटां कै ब्यायोड़ी थी, जकी धणी कै मर्यां पछै आप कै टाबर नैं लेकर पी'र में भाड़ंग आग्यी'र अठै ही रेवण लागी। सोहुवा जाट बा दिनां भाड़ंग में गढ़ घलावै हा पण गढ़ चिणनी में को आवै थो नीं। कह'कै दिन में जितो गढ़ चिणता हा बो रात नैं पाछो ढह ज्यांतो। जणा कोई बोल्यो'क नींव में नर बलि दिये बिना गढ़ कोनी चिण्यो जा सकै, पण कोई माणस आपकी बलि देवण नैं त्यार को थो नीं। तो सोहुवां के करी'क आप हाळी विधवा बेटी कै नानियैं नै गढ़ की नींव में चिण दियो। बा बिच्यारी रो-पीट कर रहगी। गढ़ त्यार होग्यो पण मां कै मन में बो दु:ख बरोबर सालतो रैयो। (ओ बीं बखत एक लोक विश्वास हो। आ बात जोधपुर कै गढ़'र चूरू कै राजगढ़ वाळै गढ़ बेई भी कही जा है।)
संजोग की बात। एक दिन बा डीकरी ढाब पर पाणी भरै थी जद एक जणो बठै पाणी पीण नैं आयो तो पूछणै पर आप की ओळखाण सारण जाट की कराई तो सारण नांव सुणतां ही डीकरी को दुखड़ो उबळ पड़्यो'र बा धिक्कारती बोली'क के सारण ईं धरती पर हाल ही जीवंता ही फिरै है के ? पाणी पीण नैं ढुकण हाळै कै पूछणै पर बा डीकरी सगळी बात खोल'र कही। जिकी सुण'र बो बिना पाणी पिये ही चल्यो गयो'र जा कर सगळै सारणां नैं आ कथा सुणाई। ईं बात पर सारणा भाड़ंग पर चढ़ाई करी। जबरी राड़ होई'र आखर में भाड़ंग पर सारणा को कब्जो होग्यो।
चूरू मण्डल कै इतिहास में गोविन्द अग्रवाळ लिखै'क सम्भव है; भटनेर'र भटिंडा की ज्यूं भाड़ंग भी कदे सिमरिद्ध नगर रयो होवै। चुहाणा कै राज की टेम भाड़ंग स्यात जैन धरम को कोई एक आच्छो थळ थो। आ बात तारानगर कै जैन मंदिर में पड़ी मूर्त्यां सैं भी कह सकै है। जैन ग्रंथां का बिदवान बीकानेर का अगरचन्द नाहटा 'लछागर रास' नैं 15वीं सदी में रचणो मानैं हैं जैं में भाड़ंग बेई लिखेड़ो है-

जंबू दीविहि भरह खेति, भाडंगु भणी जई,
बागड़ दसि सिंगार हारू, कवि जणिहिं थुणी जइ।
तासु सीम सावय समूहि, दस दिसिहिं विदितउ,
गामु गडावउ सिरि निवासु सुरपुरू जिणी जीतउ।

मतलब जम्बू द्वीप-भरत छेत्र में प्रसिद्ध बागड़ देस है; जीं कै सिणगार हार कै रूप में भाडंगु (भाड़ंग) बसै है, जैं की सींव ऊपर गडाणउ (गडाणा) नांव को सोवणो गांव है। जठै लिछमी को वास है।
लछागर रास को कवि बागड़ देस में भाड़ंग'र गडाणो नेड़ै-नेड़ै बता कर दोनुवां कै बारै में स्थिति एक दम साफ करी है। गडाणै पर चाहिल चुहाणा को राज हो। मतलब'क भाड़ंग 15वीं सदी में एक आच्छ्यो सिमरिद्ध नगर हो। चूरू मण्डळ में जाटां को महताऊ इतिहास रैयो है। पण ख्यात कै नतै कोई पुख्ता बात सिवाय भाटां की पट मेळी कै को मिल्यो नीं। घणखरी गपोड़ां चढ़ी दंत कथावां ही चाली आवै है। ले देकर ठाकुर देशराज को एक इतिहास है, पण बै भी घणी बेगार करकै क्यूं सही तो क्यूं अप्रमाणित-प्रमाणित रो मेळो कर्यो है।
बीकानेर राज्य की ख्यातां'र इतिहास मुजब बीकानेर थरपणा सैं पहली ईं जगां में जाटां का 7 जनपद सिरै था। कहावत है ''सात पट्टी'र सित्यावन मांझरा'' ,मतलब अठै जाटां का 7 बडा'र 57 छोटा ठिकाणा हा। ईं सातूं बडै जाट राज्यां की ये 7 राजधानियां- 1. सेखसर, 2. सूंईं, 3. धाणसियो, 4. भाड़ंग, 5. रसलाणा, 6. सिधमुख, 7. लुदी बड़ी थी। आं में सेखसर चूरू सैं आथण-उतरादो 58 मील'र लुदी बडी उतरादी-उगण 38 मील है। यूं चूरू नैं नामी मानणै सैं सेखसर सैं लुदी बडी ताणी 120 डिग्री रो कूणियो बणै है'र ऊपर मंडी सै राजधानियां इण ही घेरै में आज्या है। अै राजधानिया मांय सैं कोई भी राजधानी चूरू सैं 60 मील सैं ज्यादा दूर कोनी। आपस में एक-दूसरी सैं आं को पछेतो 25 मील सैं बत्ती कोनी। आं में सैं भाड़ंग, सिधमुख'र लुदी बडी तो चूरू जिलै की तारानगर अर राजगढ़ तसील में है। सेखसर'र सूईं बीकानेर में अर रसलाणो हनुमानगढ़ जिलै में हैं।
सेखसर में पांडु गोदारो, सूईं में चोखो सिहाग, धाणसियै में अमरो सहू, भाड़ंग में पूलो सारण, रसलाणै में बेणिवाळ रायसळ, सिधमुख में कस्वों कंवरपाल अर बडी लुदी में कांनो पूनियो राज करतो हो। पण आं कै सिवाय भी मांझरा कै बीच में जाटां की दूसरी साखावां'र और जातियां का गांव भी मिल्योड़ा था।
ईं जाट राज्यां में गोदारा सैं स्यूं सबळ गिण्यां जावंता हा। पण जोहिया'र भाटियां आद कै झगड़ां सैं पिण्ड छुटावण राव बीकै राठौड़ की सत्ता मान ली ही'र ब्यूं भी आं की आपसरी में फूट'र द्वेस भरी होड लागी रहती ही। अर ओ एक जोग बैठणो हो'क बीं बखत एक इस्सी घटना घटी कै बीं सैं ईं जाट राज्यां की फूट सिलग उठी, जैं को भी फायदो राठौड़ां नैं मिल्यो। आ घटना बीकानेर कै इतिहास में यूं है'क- '' गोदारो सिरदार पांडु जिसो वीर हो बिसो ही बड़ो दातार भी थो। बै एक ढाढ़ी नैं मोकळो दान दियो। जैं कैं जस मांय गीत गावंतो ढाढ़ी पूलै सारण कै अठै भाड़ंग पूंच्यो। लोक मुख पर एक दोवो है -
धजा बांध बरसै गोदारा, छात भाड़ंग की भीजै।
ज्यूं ज्यूं पांडू गोदारो बगसै, पूलो मन में छीजै।।

पूलै भी बीं ढाढ़ी नैं आच्छो दान दियो। पण पूलो जद आपकै म्हैल में गयो तो बीं की जोड़ायत मलकी (बेणीवाळ) तानैं में हंस'र बोली कै दानी तो पांडु बरगो होवै। मद में छिक्योड़ो सिरदार आव देख्यो न ताव, आ सुणताईं कैयो कै जै तूं पांडु ऊपरां रीझी है तो बीं कनै ही चली जा। लुगाई की जात, धणी की ईं हरकत सैं मलकी कै गस बैठगी'र बा चौधरी सैं बोलणो बंद कर दियो। मलकी किणी हलकारै रै सागै पांडु ताणी सगळी बात पुगाई अर कुहायो कै म्हनैं लेज्या। अयां महीनां 6 निकळग्या। एक दिन सै सारण जाटां चौधरी-चौधरण रो मेळ करवावण ताणीं पूलै रै अठै भेळा होया। गोठ-घूघरी करी। इनै तो गोठ उडरी ही अर बिनै पांडु कोई साठेक ऊंट सुवारां रै सागै भाड़ंग आयो'र मलकी नै छानै-मानै ही सेखसर लेग्यो। पांडु बूढो होग्यो हो पण मलकी नै आपकै घर घालली। ईं सैं नकोदर की मां (पांडु की पैलड़ी लुगाई) सैं पांडु की खट-पट रहण लागगी। मलकी नैं पांडु रै घरां मान कोनी मिल्यो तो बा गांव गोपलाणै में जा'र रैवण लागग्यी। इण भांत मलकी न तो इन्नै की रैयी अर न बिन्नैं की। पछै आपकै नांव पर मलकीसर गांव बसायो।
बिन्नै इब भाड़ंग में मलकी की खोज-खबर होई'र सगळो भेद खुल्यो तो पूलै सलाह करण नै दूसरै जाट मुखियावां नैं भेळा कर्या पण गोदारां की पीठ पर राठौड़ देख कर बां की चढाई करण की तो हिम्मत को होई नीं । बै सगळा मिल कर सिवाणी कै नरसिंह जाटू कनैं गया'र आपकी सहायता ताणी बीं नैं चढ़ा ल्याया।

(. इतिहासकार नैणसी तो पांडु खुद को आणो लिख्यो है पण दयालदास बीं कै बेटै नकोदर का आकर मलकी नैं लेज्याणो लिख्यो है। पाउलेट भी कोई १५० ऊंटा ऊपरां नकोदर को आकर लेज्याणो लिख्यो है। देखो-चूरू मं.शो.पू.इ. पाद टिप्पणी सं.४ पृष्ठ ११० ।
२. नरसिंह जाटू नैं ल्याण नैं अै अै जाट गया-सिधमुख को कस्वों बडो कंवरपाल(मलकी को नानो) , बेणीवाल रायसल (मलकी को बाप) , भाड़ंग को पूलो सारण (मलकी को खसम) , धाणसियै को सहू अमरो (मलकी की भूवा को बेटो भाई) , सूंईं को सिहाग चोखो, लूदी को पूनियो कानो। देखो चू. म. शो. पू. इ. पृष्ठ १११ ।)


तंवर सिरदार नरसिंह जाटू बडो सूरवीर जोधो हो। बो आप की सेना सुदां आयो'र गोदारै पांडू कै ठिकाणै लादड़ियै पर हमलो कर्यो। गांव बाळ दियो'र पांडू कै मोकळा मिनखां नै मार कर पाछो होयो। पांडू को बेटो नकोदर राठौड़ां कनैं मदद ताणी पूच्यों। राठौड़ां कै मुखियां में बीको'र कांधल बीं बखत सिधमुख लूंटण नैं गयोड़ा था'र नरसिंह भी जोग सैं आप कै ठिकाणै लौटतो सिधमुख कै सा'रै ही ढाकां गांव में डेरो गेर्यां सूत्यो पड़्यो हो। राठौड़ रातूं रात ढाकां पूंच्या।
नींद में सूत्यै बैरी पर घात करणै नैं वीरां को काम न समझ'र कांधल वीरां रै लहजै में नरसिंह नैं चेतायो। नरसिंह चिमक कर उठ्यो। दोनूं कानियां सैं जोधा में जबरो जंग होयो पण नरसिंह अर दूसरा तंवर सिरदार किसोर जाटू राठौड़ां कै हाथ मार्यां जाणैं सैं नरसिंह का साथी'र जाट भाग खड़्या होया। पछै एक समझौतै हुयो अर राठौड़ां नैं गांवां रा ठाकर अर अै जाट गांवां रा चौधरी रैया। एक भांत ईं लड़ाई में मात खा कर तो सैं ही जाट मुखिया सहज में ही राठौड़ां नैं राजा मान लिया हा।
भाड़ंग 16 वीं सदी की कई पोथियां में समैंर परसंग सारू ठोड-ठोड चर्चित है। चूरू मण्डळ कै शोधपूर्ण इतिहास कै 17 वैं अध्याय कै परिशिष्ट 2 पन्नै 378 में बीकानेर कै चौथै राव जैतसी (सं.1583-1598) मुगल बादशाह बाबर कै बेटै कामरां नैं बीकानेर की चढाई पर गहरी किस्त देकर भगायो जणा बी बखत कै जुद्ध को हाल चूरू जिलै की तसील सिरदारसहर कै गांव खिलेरिया की चारण सूजै बीठू डिंगल में 'छंद राव जैतसी' लिख्यो थो, जैं सैं भी नरसिंह को मार्यो जाणो और भाड़ंग पर राठौड़ां को कब्जो होणो पायो जावै है।
बारडिक एण्ड हिस्टोरिकल सर्वे आफ राजपूतानां 'छंद राउ जइतसीरउ बीठू सूजइरउ कहियउ' एशियाटिक सोसाइटी कलकता सैं प्रकाशित,सम्पादित डॉ. एल.पी.तैसितोरी, पन्नै 10 पर छंद संख्या 42 -

नरसिंध मारि उपाड़िनेस,
दीवाण भाण थर हरिय देस।
भाड़ंग तणा खाई भुरज्ज,
राहउडि रोळि किय रज्ज रज्ज ।। 42 ।।
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(ओ इतियास पुराणो भाड़ंग जको भाड़ंगाबाद रै नांव सूं ई जाण्‍यो जावंतो, उण रो है। आज जठै भाड़ंग आबाद है उण रो एक न्‍यारो-निकेवळो इतियास है। कीं दीठ चितराम अर कीं दीठ आखरां रै पांण नीचै दीरीज रैयी है।)



2 comments:

  1. आपका गाँव बहुत सुन्दर है उतनी ही बढ़िया आपकी लेखनी भी है |

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